आकांक्षा से उपलब्धि तक: भारत में बुनियादी साक्षरता में तीव्र एवं व्यवस्था-आधारित सुधार का उदाहरण

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आकांक्षा से उपलब्धि तक: भारत में बुनियादी साक्षरता में तीव्र एवं व्यवस्था-आधारित सुधार का उदाहरण भारत में हुए सुधार यह दर्शाते हैं कि किस तरह राजनीतिक प्रतिबद्धता और सरकार के हर स्तर पर समन्वित नेतृत्व से महत्वाकांक्षाओं को मापनीय शैक्षिक उपलब्धियों में बदला जा सकता है।

This blog post was originally published October 28th, 2025 on the Global Partnership for Education (GPE) 'Education for All' blog here.

 

उत्तर प्रदेश की एक कक्षा में, कक्षा तीन का एक विद्यार्थी ज़ोर-ज़ोर से एक कहानी की किताब पढ़ कर सुना रहा है। यह उस विकास की कहानी है जो महज़ दो साल पहले असंभव सी लगती थी।

ग्लोबल कोएलिशन फॉर फाउंडेशनल लर्निंग के प्रतिनिधि मंडलों, ह्यूमन कैपिटल अफ्रीका (एचसीए) और एसोसिएशन फॉर द डेवलपमेंट ऑफ एजुकेशन इन अफ्रीका (एडीईए) के सहभागियों के लिए यह अवसर इस संदर्भ में महत्वपूर्ण था कि कैसे सरकार के विभिन्न अंगों के बीच समन्वित सहयोग और राजनीतिक स्थिरता से कोई राज्य अपनी महत्वाकांक्षाओं को ज़मीनी हक़ीक़त में तब्दील कर सकता है।

सितंबर में, कोएलिशन और उसके साझेदारों ने दुनिया के सबसे महत्वाकांक्षी शिक्षा सुधारों में से एक को करीब से देखा। यह सुधार ‘निपुण भारत’ (नेशनल इनीशिएटिव फॉर प्रोफिसीएंसी इन रीडिंग विद अंडरस्टैंडिंग एंड न्यूमरैसी) है, जिसे 2021 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत शुरू किया गया था। इसका मकसद यह है कि देश की हर स्तर की सरकार मिलकर काम करे। लक्ष्य साफ है कि हर बच्चा पढ़ सके और बुनियादी गणित समझ सके।

इस दौरे ने बड़े पैमाने पर हो रहे शिक्षा सुधारों को करीब से देखने का मौका दिया। साथ ही यह समझने का अवसर भी मिला कि दक्षिण–दक्षिण सहयोग के ज़रिए अफ्रीका में बुनियादी शिक्षा के परिणामों को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है।

संदेश बिल्कुल स्पष्ट है। अगर राजनीतिक प्रतिबद्धता हो, लक्ष्य स्पष्ट हों, प्रमाण आधारित योजनाएं हो और आंकड़ों को देखते हुए काम किया जाए, तो सभी बच्चों के सीखने के स्तर में तेज़ी और बड़े पैमाने पर सुधार संभव है।

अभूतपूर्व पैमाने पर मापने योग्य प्रगति

भारत के सुधार पहले से ही परिणाम दे रहे हैं।

बेहद बड़े पैमाने पर दर्ज की गई ठोस और मापनीय प्रगति भारत में हो रहे सुधारों के परिणाम सामने आने लगे हैं।

सिर्फ दो साल में, देश के अलग-अलग राज्यों में बच्चों की बुनियादी शिक्षा के स्तर में सुधार दिखा है। उत्तर प्रदेश की आबादी 24 करोड़ से भी ज़्यादा है (जो नाइजीरिया से भी अधिक है) और यहां कक्षा 3 के बच्चों की बुनियादी शिक्षा के स्तर में काफ़ी सुधार हुआ है। वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट (असर) 2024 के अनुसार, कक्षा तीन के जो बच्चे कक्षा दो का पाठ पढ़ने में समर्थ हैं (ये भारत में साक्षरता के शुरुआती स्तर की जांच का पैमाना है), उनकी संख्या 2022 में 24 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 34 प्रतिशत हो गई है।

यह वाकई एक उल्लेखनीय उपलब्धि है, वह भी यह स्थिति सिर्फ़ एक राजनीतिक कार्यकाल के भीतर देखी है, जो पूरे देश में राज्यों में शिक्षा की लगातार बेहतर होती स्थिति को भी दर्शाती है।

ताज़ा राष्ट्रीय मूल्यांकन ‘परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2024' के कक्षा तीन के आंकड़े बताते हैं कि कई राज्यों में सरकारी स्कूल अब निजी स्कूलों से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।   भारत ने साबित किया है कि यदि कोशिश सही दिशा में हो, खासकर दूर-दराज़ के स्कूलों पर ध्यान दिया जाए, तो हर बच्चा पढ़ना सीख सकता है और सरल गणित कर सकता है।

कैसे समूचे तंत्र को सक्रिय किया गया।

भारत ने मूलभूत शिक्षा को राष्ट्रीय विकास और आर्थिक प्रगति की नींव के रूप में प्रस्तुत किया। इससे 'निपुण' भारत को राजनीतिक प्राथमिकता मिली। यह मिशन एक स्पष्ट रोडमैप देता है, जिसका उद्देश्य है कि वर्ष 2026–27 तक हर बच्चा कक्षा 3 तक पहुंचते-पहुंचते बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान में दक्ष हो जाए। यह पहल देश भर के 5 करोड़ से अधिक बच्चों तक पहुँचेगी।

भारत के सुधार कार्यक्रम ऐसे कई तत्वों पर आधारित हैं जो एक-दूसरे पर परस्पर निर्भर हैं:

  • राजनीतिक नेतृत्व: राज्यों को सुधारों को लागू करने की जिम्मेदारी दी गई है। वे साक्षरता एवं शिक्षा से जुड़े लक्ष्य तय करते हैं और उन तक पहुंचने के लिए आपसी प्रतिस्पर्धा भी करते हैं। अब शिक्षा को लेकर मौजूदा राजनीतिक महत्वाकांक्षा ठोस लक्ष्यों एवं उनके योजनाबद्ध कार्यान्वयन के माध्यम से स्पष्ट जवाबदेही में बदल रही है।
  • कार्यान्वयन ढांचा: हर स्तर पर परियोजना प्रबंधन इकाइयां (पीएमयू) सक्रिय हैं, जिन्हें मज़बूत वित्तीय समर्थन दिया जा रहा है ताकि शिक्षा सुधार से जुड़ी नीतियों को ज़मीनी स्तर पर उतारने की क्षमता विकसित की जा सके और उसमें निरंतरता बनी रहे। इस प्रक्रिया में स्थानीय प्रतिभा का भी प्रभावी इस्तेमाल किया जा रहा है।
  • संरचित शिक्षण पद्धति: शिक्षक कार्यपुस्तिकाओं और पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से छात्रों को योजनाबद्ध तरीके से पढ़ाते हैं। यह सामग्री छात्रों की अपनी भाषा में होती है, ताकि उन्हें पाठ आसानी से समझ आए। राष्ट्रीय पाठ्यक्रम क्लासरूम में शिक्षण की प्रक्रिया को स्पष्ट एवं दक्षता आधारित लक्ष्यों से जोड़ता है।
  • सहभागियों एवं वातावरण से मिलता सहयोग: प्रथम, सेंट्रल स्क्वायर फ़ाउंडेशन (सीएसएफ) और लैंग्वेज ऐंड लर्निंग फ़ाउंडेशन (एलएलएफ) जैसी नागरिक संस्थाएं सरकार के साथ मिलकर शिक्षा सुधारों को आगे बढ़ाने का काम कर रही हैं। ये संगठन सुधारों के लिए नीति-स्तर पर पहल करते हैं, कार्यक्षमता विकसित करते हैं और गति बनाए रखते हैं। इन प्रयासों को देश के परोपकारी संगठनों का भी सहयोग मिल रहा है, जो प्रमाण-आधारित कार्यक्रमों में निवेश कर रहे हैं। इससे सरकारी तंत्र की क्षमता मज़बूत होती है और नेतृत्व की प्रभावशीलता बढ़ती है।
  • आंकड़ों की मदद से निर्णय लेना: राष्ट्रीय मूल्यांकन के साथ-साथ शिक्षकों और प्रशिक्षकों के लिए डिजिटल उपकरण उपलब्ध हैं। इनकी मदद से वे बच्चों की ज़रूरत के अनुसार शिक्षण प्रक्रिया में ज़रूरी बदलाव कर सकते हैं, और बच्चों की प्रगति पर भी लगातार नज़र रख सकते हैं।

रूबिक क्यूब की तरह, यह प्रगति कई कारकों के एक साथ सटीक जुड़ाव पर निर्भर थी—शिक्षण पद्धति, शिक्षकों को उपलब्ध सहायता, प्रशासन, आँकड़ों का संग्रह, मूल्यांकन तंत्र और नेतृत्व। जब ये सभी पहलू एक दिशा में काम करने लगे, तो एक मज़बूत और एकीकृत व्यवस्था बनी। इसी तालमेल ने तेज़ प्रगति को संभव बनाया और एक ऐसा मॉडल तैयार किया जिसे अन्य देश अपनी ज़रूरत के अनुसार अपना सकते हैं।

उपलब्धियों को गहरा एवं टिकाऊ बनाना।

भारत की प्रगति प्रभावशाली है, लेकिन काम अभी पूरा नहीं हुआ है।  इस दिशा में अगला चरण निपुण भारत को 2026- 27 के बाद भी मज़बूती से जारी रखने पर केंद्रित होगा, ताकि हर बच्चे को बुनियादी कौशल दिया जा सके। इसके तहत कक्षा तीन से पांच तक के उन बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा जो अभी पीछे हैं, और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि शिक्षण मार्गदर्शिकाएं, पाठ्य योजनाएं और कार्यपुस्तिकाएं प्रभावी ढंग से इस्तेमाल हों और नियमित प्रशिक्षण व मार्गदर्शन से उन्हें और मजबूत बनाया जाए।

साथ ही, बहु-कक्षीय और बहुभाषी कक्षाओं जैसी प्रणालीगत चुनौतियों का समाधान करना भी ज़रूरी होगा, शिक्षा में हो रही प्रगति समावेशी और टिकाऊ हो।  भारत शिक्षा में गुणवत्ता, समानता और स्थायित्व को लगातार प्राथमिकता देकर उन देशों के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है, जो शिक्षा में शुरुआती सफ़लता से आगे बढ़कर समूचे तंत्र में व्यापक सुधार लाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

साझा सीख से बढ़कर कार्यवाही की ओर।

बुनियादी शिक्षा के लिए वैश्विक गठबंधन और अफ्रीकी साझेदारों के लिए भारत की यह यात्रा दक्षिण–दक्षिण सहयोग की ताकत का स्पष्ट उदाहरण बनी है। साथ ही इसने वैश्विक उत्तरी देशों को भी यह समझ दी है कि सीखने के परिणामों में तेज़ सुधार लाने के लिए देशों को किस तरह विविध रूपों में सहयोग की आवश्यकता होती है और उन्हें किस प्रकार वित्तपोषित किया जा सकता है।

अफ्रीकी साझेदारों के लिए भारत की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि बड़े पैमाने पर तंत्रगत बदलाव संभव है और सरकारें स्वयं इसकी अगुवाई कर सकती हैं।

आने वाले भविष्य में, कोएलिशन और उसके साझेदार को 2025 में अक्रा में होने वाले एडीइए (असोसिएशन फॉर द डेवलपमेंट ऑफ एजुकेशन इन अफ्रीका) के त्रैवार्षिक सम्मेलन में कार्यक्रम से मिले इन महत्वपूर्ण सबकों पर आगे काम के लिए उत्सुक हैं। इस सम्मेलन में वे मंत्रियों, नीति-निर्माताओं और कार्यान्वयन से जुड़े विशेषज्ञों के साथ मूलभूत शिक्षा के नतीजों को बेहतर बनाने, आंकड़ों को साझा करने के विभिन्न तौर-तरीकों पर चर्चा करेंगे ताकि दुनिया का हर बच्चा बुनियादी कौशल में मज़बूत हो सके और आगे की शिक्षा तथा अवसरों का आधार तैयार कर सके।

भारत से मिली सीख और अनुभव।

भारत का अनुभव अन्य देशों के लिए कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:

  • शिक्षा में सुधार राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का केंद्र बने: जब सुधार सरकार के नेतृत्व में हों और उन्हीं के माध्यम से वित्तपोषित हों, तो वे नीतियों, बजटों और संस्थागत ढाँचों में स्पष्ट प्राथमिकता के रूप में दिखाई देते हैं। अन्य देश भी अपनी राष्ट्रीय विकास रणनीतियों में बुनियादी सीखने को केंद्र में रखकर ऐसी ही दिशा अपना सकते हैं।
  • साक्ष्यों का उपयोग करें और तंत्र के अनुसार कार्यक्रम को बड़े पैमाने पर लागू करें: भारत पूरे देश में संरचित शिक्षण पद्धति लागू कर रहा है, उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा सामग्री, क्रमबद्ध पाठ्य योजनाएं, शिक्षण मार्गदर्शिकाएं और छात्रों को अलग से मार्गदर्शन की व्यवस्था, जो कक्षा में शिक्षण की प्रक्रिया को मजबूत बनाती है। इसके अलावा, पाठ्यक्रम, शिक्षण सामग्री, मूल्यांकन और प्रशिक्षण जैसे कार्यक्रम भी एक दूसरे को मजबूती प्रदान करते हैं। इसके कारण इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। यह कार्यक्रम उन देशों के लिए मार्गदर्शक की तरह है जो शिक्षा में किए जा रहे अनुसंधानों को धरातल पर लागू करना चाहते हैं।
  • शिक्षण के मूल तत्वों में निवेश करें: महज़ शिक्षकों को वेतन देने और आधारभूत ढांचा खड़ा करने से आगे बढ़कर भारत सीधे शिक्षण के मूल ढांचे में निवेश करता है। जैसे: शिक्षण मार्गदर्शिकाएं, पाठ योजनाएं, कार्यपुस्तिकाएं, और शिक्षा वितरण की क्षमता, जिससे शिक्षा में प्रत्यक्ष रूप से सुधार देखने को मिलता है। अन्य देश भी कक्षा में शिक्षण प्रक्रिया से जुड़े कारकों में निवेश करके इस कार्यक्रम को अपने यहां भी लागू कर सकते हैं।
  • व्यवस्था को मज़बूत बनाने के लिए साझेदारों को सशक्त करें: नागरिक समाज संगठन और स्थानीय परोपकार संगठन राज्य प्रणालियों को मजबूत बनाते हैं और जिससे सुधार कार्यक्रम भी टिकाऊ बन पाते हैं। उनकी भूमिका तब सबसे प्रभावी होती है जब वे सरकारी प्रणालियों के भीतर काम करते हैं, न कि उनके समानांतर।
  • शिक्षा संबंधी लक्ष्यों के लिए जनता के बीच राजनीतिक और समाजिक मांग पैदा करना: शिक्षा संबंधी लक्ष्यों पर काम करते हुए भारत राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देता है, जिससे बुनियादी शिक्षा राजनीतिक प्राथमिकता मुद्दा बन गई है। संचार की मजबूती और सामुदायिक भागीदारी ने शिक्षा में सुधार की सार्वजनिक मांग में इज़ाफ़ा किया है। साथ ही जनता में यह समझ भी बढ़ी है कि प्रगति हर राज्य की परिस्थितियों, क्षमताओं और शुरुआती संसाधनों पर निर्भर करती है।

बेंजामिन पाइपर

हेड ऑफ एजुकेशन, द बिल एंड मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन

जूडिथ हरबर्टसन

डेवलपमेंट डायरेक्टर, फ़ॉरेन कॉमनवेल्थ एंड डेवलपमेंट ऑफ़िस

लुइस बेनवेनिस्ते

ग्लोबल डायरेक्टर फॉर एजुकेशन एंड स्किल्स

पिया रेबेलो ब्रिट्टो

ग्लोबल डायरेक्टर, एजुकेशन एंड एडलोसेंट डेवलपमेंट, यूनिसेफ

स्टेफ़ानिया जियानिनी

असिस्टेंट डायरेक्टर-जनरल फॉर एजुकेशन, यूनेस्क

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