भारत में वित्तीय नवाचार का एक समृद्ध इतिहास है। चौथी-छठी शताब्दी में व्यापारी और कारीगर शिल्पिसंघ (श्रेणियां) द्वारा, जो बिल्कुल आज के निवेश ट्रस्टों की तरह थे,संसाधनों को एकत्रित करते थे, जोखिम साझा करते थे, और बड़े उद्यमों को वित्तपोषित करते थे।
भारत वर्ष 2047 तक उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था बनना चाहता है, इसलिए उसे एक गतिशील, समावेशी और अनुकूलित वित्तीय प्रणाली बनाने के लिए अपने इस अतीत को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है, जो निवेश-जीडीपी अनुपात को वर्तमान 33.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत करने में मदद कर सके, जिससे आर्थिक विकास और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन को बढ़ावा मिले ।
चुनौतियां और अवसर
पिछले कुछ वर्षों में, भारत की वित्तीय परिसंपत्तियां सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 190 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं, और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान (एनबीएफआई) और पूंजी बाजार निजी क्षेत्र के ऋण का लगभग आधा हिस्सा प्रदान करते हैं। पारंपरिक बैंकिंग से यह बदलाव किसी भी देश के लिए उच्च आय का दर्जा प्राप्त करने हेतु आवश्यक है ।
फिर भी, इस सतत परिवर्तन की अपनी चुनौतियां हैं। चूंकि कई कंपनियां अलग-अलग नियामकों को रिपोर्ट करती हैं, इसलिए इसके लिए मज़बूत मैक्रो-प्रूडेंशियल निगरानी की आवश्यकता होगी। इसके अलावा, मध्यवर्गीय संस्थाओं की बढ़ती संख्या के कारण सही ऋण देने और उधार लेने के निर्णय पैर असर पद सकता है और वित्तीय समावेशन में ठहराव आ सकता है।
दूसरी ओर, पूंजी बाजारों और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं (एनबीएफआई) का बढ़ना - जो आम तौर पे पारंपरिक बैंकों की तुलना में कम जोखिम-निवारक होते हैं - दीर्घकालिक वित्तपोषण जुटाने का अवसर प्रदान करता है। तथापि, चुनौती विभिन्न क्षेत्रों - बुनियादी ढांचा, एमएसएमई, स्थिरता और उभरते क्षेत्रों - में निवेश की बढ़ती मांग को पूरा करने की होगी।
प्रमुख सुधार क्षेत्र
चार प्रमुख सुधार क्षेत्र भारत को एक आधुनिक वित्तीय क्षेत्र बनाने में मदद कर सकते हैं जो वर्ष 2047 तक उच्च आय की स्थिति प्राप्त करने के उसके लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक हो सकते हैं:
1) निश्चित आय के बाजारों को खोलना। बीमा और पेंशन फंडों की सरकारी प्रतिभूतियों से परे निवेश करने की क्षमता का विस्तार करने से सामूहिक बॉन्ड की घरेलू मांग बढ़ सकती है, जो उभरते बाजारों के प्रतिस्पर्धियों से पिछड़ रहे हैं। सुधार के अन्य क्षेत्रों में ऋण प्रतिभूतियों के लिए अनुकूल कर व्यवस्था वाली बचत योजना शुरू करना, ऋण संवर्धन उत्पाद विकसित करना (पढ़ें - भारत के विशाल बुनियादी ढाँचे के वित्तपोषण की कमी को कम करना), और मिनी-बॉन्ड, प्रतिभूतिकरण प्लेटफ़ॉर्म और कवर्ड बॉन्ड जैसे नवीन वित्तीय साधनों को लॉन्च करना शामिल है )।
2. एमएसएमई की वित्त तक पहुंच बढ़ाना। यद्यपि, सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट (सीजीटीएमएसई) जैसी आंशिक ऋण गारंटी योजनाओं ने एमएसएमई को ऋण देने में बैंकों के जोखिम की धारणा को कम किया है, फिर भी वित्तपोषण का अंतर सकल घरेलू उत्पाद के 11 प्रतिशत के पर्याप्त स्तर पर बना हुआ है। आगे और भी संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है। सर्वप्रथम, सूचना की विषमता को अभी भी कम करने की आवश्यकता है। इसके लिए, क्रेडिट सूचना कंपनियों को गैर-क्रेडिट डेटा संसाधित करने की अनुमति दी जानी चाहिए, जबकि अकाउंट एग्रीगेटर को ग्राहकों की संपत्तियों के अलावा अन्य डेटा संसाधित करने में सक्षम होना चाहिए। उसके बाद, एक एकीकृत सुरक्षित लेनदेन कानून स्थापित किया जाना चाहिए और भूमि रजिस्ट्री का डिजिटलीकरण किया जाना चाहिए। तीसरी बात यह है कि राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरणों (एनसीएलटी) की क्षमता में सुधार करके दिवालियापन ढांचे को मजबूत किया जाना चाहिए।
3. जलवायु वित्त को बढ़ावा देना। नीति आयोग ने अनुमान लगाया है कि भारत को अपनी ऊर्जा प्रणालियों को शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए तैयार करने हेतु वर्ष 2047 तक प्रति वर्ष 250 अरब डॉलर का निवेश करना होगा। हालांकि, वर्तमान में यह निवेश, विशेष रूप से घरेलू स्रोतों से, काफी कम है। इन निवेशों में तेज़ी लाने के लिए, भारत को एक मज़बूत नियामक ढांचा लागू करना होगा, हरित वित्तपोषण के लिए प्रोत्साहनों की तलाश करनी होगी और मिश्रित वित्त समाधानों को बढ़ावा देना होगा। सामूहिक सामाजिक उत्तरदायित्व के लिए एक संशोधित कानूनी ढांचा भी बड़ी मात्रा में रियायती संसाधन जुटाने में मदद करेगा।
4. कम लेकिन बेहतर सरकारी स्वामित्व वाले वित्तीय संस्थान (एसओएफआई)। सरकारी बैंक, एनबीएफआई, बीमा कंपनियां और पेंशन फंड का अभी भी भारत की वित्तीय प्रणाली पर वर्चस्व है, फिर भी उनकी उपस्थिति में कमी आई है। वर्ष 2023 में, इनके पास कुल वित्तीय क्षेत्र की संपत्ति का 57 प्रतिशत हिस्सा था, जो वर्ष 2017 में 64 प्रतिशत था। हालांकि एसओएफआई ने अब तक विकास वित्त में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन उनकी राजकोषीय लागत भी अधिक रही है (वित्त वर्ष 18-21 के बीच सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए 38.8 बिलियन डॉलर से अधिक आवंटित किए गए)। सरकार के निजीकरण के एजेंडे को आगे बढ़ाने और कॉर्पोरेट प्रशासन को अंतर्राष्ट्रीय सर्वोत्तम पद्धतियों के अनुरूप बनाने के अलावा, एसओएफआई को सह-उधार, ऋण वृद्धि और जोखिम-साझाकरण तंत्र, गारंटी और संयुक्त निवेश के माध्यम से अतिरिक्त निजी वित्तपोषण जुटाने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। एसओएफआई पूंजी बाजारों को मजबूत करने और हरित वित्तपोषण को बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। साथ ही, सरकार को प्राथमिकता क्षेत्र के ऋण का पुनर्मूल्यांकन करना होगा ताकि इसे वित्तीय क्षेत्र के विकास के साथ जोड़ा जा सके।
मज़बूत संस्थागत सहयोग आवश्यक होगा
वित्तीय कुशलता के अपने समृद्ध इतिहास का लाभ उठाते हुए, भारत को अब वित्तीय क्षेत्र के लिए एक सामूहिक और समन्वित दृष्टिकोण अपनाना होगा। नियामकों, नीति निर्माताओं और वित्तीय संस्थानों को एकजुट करने वाला मज़बूत संस्थागत सहयोग ज़रूरी होगा। वित्तीय संस्थानों (एसओएफआई) की भूमिका को पुनर्निर्देशित करना, निश्चित आय बाज़ारों को खोलना, ऋण ढांचे का आधुनिकीकरण करना और जलवायु वित्त को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण होगा। अंततः, ये प्रयास भारत के बढ़ते युवा समूहों के लिए रोज़गार के अवसरों का विस्तार करने में मदद करेंगे, जिससे अधिक नागरिक भारत की विकास गाथा का हिस्सा बन सकेंगे।
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