2021 में, जब पूरी दुनिया महामारी से जूझ रही थी, भारत ने एक असाधारण उपलब्धि हासिल की। देश ने दुनिया की पहली डीएनए आधारित कोविड-19 वैक्सीन का विकास किया। स्वदेशी रूप से विकसित इस वैक्सीन को इतनी तेजी से विकसित इसलिए किया जा सका क्योंकि इसमें शिक्षा जगत, उद्योग और सरकार का सम्मिलित योगदान था, जिसने भारत में नवाचार को बढ़ावा दिया।
2017 में शुरू किया गया भारत का नेशनल बायोफार्मा मिशन (एनबीएम) इस सहयोगी मॉडल की सफलता का स्पष्ट उदाहरण है। यह मिशन जैव प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (बिरैक) द्वारा संचालित किया गया और इसका उद्देश्य बायोफार्मास्यूटिकल्स के विकास की गति को तेज़ करना था। वर्ष 2018 से इसे विश्व बैंक द्वारा वित्तपोषित ‘इनॉवेट इन इंडिया फॉर इन्क्लूसिवनेस’ (आई3) परियोजना का समर्थन मिल रहा है, जिसका लक्ष्य स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देना, स्टार्टअप और उद्यमिता को सहयोग देना, तथा अत्याधुनिक बायोफार्मा अनुसंधान और विकास के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा तैयार करना है।
सफलता के प्रमुख तत्व
नेशनल बायोफार्मा मिशन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक उपलब्धि यह रही कि उसने शिक्षा जगत, उद्योग और सरकार जैसे कई हितधारकों को एक साझा और सशक्त मंच प्रदान किया। इससे अलग-अलग क्षेत्रों के बीच की दूरियां कम हुईं और आपसी सहयोग को बढ़ावा मिला। उद्योग जगत एवं शिक्षा संस्थानों के बीच आपसी सहयोग के अलावा, सरकार से मिल रहे समर्थन से इस उद्योग की उन्नत तकनीकों एवं विशेषज्ञता तक पहुंच बढ़ी, जिससे अनुसंधान और विकास की प्रक्रिया तेज़ हो सकी।
मिशन के तहत विषय-आधारित वैज्ञानिक सलाहकार समूह (एसएजी) भी गठित किए गए। इन समूहों के माध्यम से ज्ञान का व्यवस्थित आदान-प्रदान संभव हुआ, वैज्ञानिक मानकों की कठोरता बनी रही और भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप बायोफार्मा उत्पादों के विकास को दिशा मिली।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि यह मिशन भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं से सीधे जुड़ा रहा। अधिक मुनाफ़े वाली उपचार विधियों तक सीमित रहने के बजाय, इसमें किफायती समाधानों को प्राथमिकता दी गई। साथ ही, ऐसे किफायती बायोफार्मास्यूटिकल उत्पादों के अनुसंधान और विकास को समर्थन मिला, जिनमें निजी निवेश कम था। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि इन नवाचारों का लाभ वंचित और कम सेवाएं पाने वाली आबादी तक भी पहुँच सके।
मिशन ने बायोटेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्र में जोखिम उठाने को भी बढ़ावा दिया, जो लंबे विकास काल और कड़े नियामकीय प्रक्रियाओं के लिए जाना जाता है। सरकार की ओर से मिलने वाली वित्तीय सहायता, मार्गदर्शन, रियायती बुनियादी ढांचे और नीतिगत समर्थन ने स्टार्टअप कंपनियों को नवाचार के लिए आवश्यक आत्मविश्वास दिया। उदाहरण के तौर पर, पुणे की मायलैब कंपनी मिशन के सहयोग से भारत की पहली स्वदेशी कोविड-19 जांच किट में विकसित करने में सफल रही।
वैज्ञानिक उपलब्धियों की दिशा में प्रगति
भारत की अग्रणी फार्मा कंपनियों में से एक, जायडस कैडिला ने देश की पहली डीएनए आधारित कोविड-19 वैक्सीन जाइकोव-डी विकसित की। इस प्रक्रिया में कंपनी ने अपनी वैज्ञानिक विशेषज्ञता और बड़े पैमाने पर उत्पादन क्षमता का योगदान दिया, जबकि मिशन ने आर्थिक और तकनीकी सहायता प्रदान की। मिशन के समर्थन से ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट (टीएचएसटीआई) और पुणे स्थित इंटरएक्टिव रिसर्च स्कूल फॉर हेल्थ अफेयर्स (आईआरएसएचए) जैसे संस्थानों ने प्रीक्लिनिकल अध्ययन, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया से जुड़े परीक्षण और नैदानिक परीक्षणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लिराफिट दवा के विकास और उसे बाज़ार में उपलब्ध कराने में भी मिशन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। लिराफिट टाइप-2 डायबिटीज के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा लिराग्लूटाइड की ही जैविक नकल है। लिराफिट की कीमत लिराग्लूटाइड की तुलना में लगभग 65 प्रतिशत कम है, जिससे डायबिटीज का इलाज अधिक किफायती हो गया है। मिशन का सहयोग केवल वित्तीय सहायता तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें मार्गदर्शन, नियामकीय प्रक्रियाओं में मदद और मिशन-समर्थित बुनियादी ढांचे तक पहुँच भी शामिल थी। इसमें क्लिनिकल मैन्युफैक्चरिंग के स्तर पर सहयोग भी मिला। यानी वह नियंत्रित उत्पादन प्रक्रिया, जिसमें दवा को सीमित मात्रा में इस तरह तैयार किया जाता है कि उसे मानव परीक्षणों में सुरक्षित रूप से इस्तेमाल किया जा सके और नियामकीय मानकों का पालन हो। इस सहयोग से स्टार्टअप को दवा विकास की जटिल प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा करने और आवश्यक मंज़ूरी हासिल करने में मदद मिली। यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, क्योंकि एक युवा उद्यम ने बाज़ार में सबसे पहले ऐसी समान प्रभाव वाली जैविक दवा पेश की, जबकि कई स्थापित कंपनियाँ अभी भी इस चरण की चुनौतियों से जूझ रही थीं।
इसी तरह, टाटा मेमोरियल सेंटर और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, बॉम्बे को रक्त कैंसर के इलाज के लिए CD19-CAR-T सेल थेरेपी विकसित करने में सहायता दी गई। जिससे इस थेरेपी की एक डोज की लागत घटकर लगभग 30,000 अमेरिकी डॉलर प्रति डोज़ रह गई, जबकि विदेशों में इसकी कीमत 3,73,000 से 4,75,000 अमेरिकी डॉलर तक होती है। एक बार फिर, मिशन का सहयोग केवल वित्तपोषण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उपचार की 'क्लिनिकल मैन्युफैक्चरिंग' के लिए एक अत्याधुनिक, किफायती और गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज़ के अनुरूप सुविधा के विकास में भी सहायक रहा इसके साथ ही, मिशन ने सेल और जीन थेरेपी के क्षेत्र में एक कुशल कार्यबल के विकास को भी बढ़ावा दिया, जो इस परियोजना को किफायती, सफल और भविष्य की अन्य थेरेपीज़ के लिए टिकाऊ बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ.
भारत में वैक्सीनों की नई श्रृंखला का विस्तार
मिशन ने डेंगू और चिकनगुनिया सहित सात अन्य संक्रमणों के लिए वैक्सीन के विकास को भी समर्थन दिया। उम्मीद की जा रही है कि इन वैक्सीनों की मदद से घातक वेक्टर-जनित बीमारियों से निपटना संभव हो सकेगा। इसके अतिरिक्त, मिशन ने डेंगू और चिकनगुनिया वायरस की जाँच के लिए नई परीक्षण प्रणालियों के विकास में सहयोग देकर इस क्षेत्र में हो रहे अनुसंधान को और मज़बूत किया। इसके तहत देश भर से एकत्र किए गए डेंगू और चिकनगुनिया के 75 क्लीनिकल नमूनों का उपयोग किया गया.
अन्य प्रमुख वैक्सीनों में 15-वैलेंट न्यूमोकोकल वैक्सीन, हेपेटाइटिस ई की वैक्सीन और एक नई मलेरिया वैक्सीन भी शामिल हैं, जो वैश्विक स्तर पर भारत के योगदान को रेखांकित करती हैं।
साझा बुनियादी ढांचे का निर्माण
बायोफार्मा क्षेत्र में प्रारंभिक अनुसंधान और विकास में आमतौर पर अधिक लागत और व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए मिशन ने ऐसे साझा बुनियादी ढांचे में निवेश किया, जिनका लाभ सार्वजनिक और निजी दोनों तरह के संस्थानों को मिल सके। अब तक देश भर में ऐसी 18 साझा सुविधाएँ विकसित की जा चुकी हैं, जो वैक्सीन, जैविक दवाओं और चिकित्सा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुसंधान, विकास और नवाचार को आगे बढ़ा रही हैं।
इसका एक प्रमुख उदाहरण पुणे में नेशनल इम्यूनोजेनेसिटी एंड बायोलॉजिक्स इवैल्यूएशन सेंटर (नाइबेक) की स्थापना है। यह केंद्र जैविक दवाओं, वैक्सीन और समान प्रभाव वाली जैविक दवाओं के प्रीक्लिनिकल और क्लिनिकल मूल्यांकन के लिए एक उत्कृष्टता केंद्र के रूप में कार्य करता है। गुड क्लिनिकल लैबोरेटरी प्रैक्टिस के मानकों का पालन करते हुए, यह केंद्र अब तक कोविड-19, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के लिए वैक्सीन की जाँच में मदद कर चुका है। इसके अलावा, यह 30 से अधिक एंटीवायरल दवाओं से जुड़े अध्ययनों को भी समर्थन दे चुका है।
दवाओं के क्लिनिकल ट्रायल्स (नैदानिक परीक्षण) में आने वाली व्यावहारिक अड़चनों को दूर करने के लिए मिशन ने एक देशव्यापी क्लिनिकल ट्रायल नेटवर्क (सीटीएन) स्थापित किया। इसके अंतर्गत ऑन्कोलॉजी, नेत्र रोग, मधुमेह और रूमेटोलॉजी से जुड़े 36 केंद्र विकसित किए गए, जो गुड क्लिनिकल प्रैक्टिस के मानकों का पालन करते हैं। इस नेटवर्क के साथ 21 रोग-आधारित पंजीकरण डेटाबेस भी तैयार किए गए हैं, जिनमें लगभग 90,000 मरीजों का सुव्यवस्थित चिकित्सीय डेटा संकलित है। इन संसाधनों के सहारे अब तक 100 से अधिक क्लिनिकल ट्रायल्स सफलतापूर्वक पूरे किए जा चुके हैं। इसके परिणामस्वरूप भारत को नियामकीय स्तर के क्लिनिकल परीक्षणों के लिए एक भरोसेमंद केंद्र के रूप में पहचान मिली है और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर भी खुले हैं।
कौशल की समस्या का समाधान
मानव संसाधन की कमी भी एक बड़ी चुनौती थी। लक्षित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए मिशन ने हजारों शोधकर्ताओं, उद्यमियों और नियामकीय विशेषज्ञों को नियामकीय अनुपालन, तकनीक हस्तांतरण तथा व्यावसायीकरण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सक्षम बनाया।
इसके साथ ही मिशन ने निम्नलिखित संरचनाओं की स्थापना को भी समर्थन दिया:
● चिकित्सीय उपकरणों के विकास के लिए चार प्रोटोटाइपिंग सुविधाएं स्थापित की गईं।
● सात टेक्नोलॉजी ट्रांसफर ऑफिस बनाए गए, जिनके माध्यम से सामूहिक रूप से एक हजार से अधिक बौद्धिक संपदा आवेदन दाखिल किए जा चुके हैं।
इन पहलों से न केवल देश में विशेषज्ञता विकसित हुई, बल्कि भारत के नवाचार तंत्र को भी मजबूती मिली।
आगे की राह
आज भारत का नेशनल बायोफार्मा मिशन न केवल देश की जैव-प्रौद्योगिकी क्षमताओं को मज़बूत कर रहा है, बल्कि यह भी दिखा रहा है कि सार्वजनिक, निजी और शैक्षणिक संस्थानों की साझेदारी किफायती स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौती का प्रभावी समाधान कैसे कर सकती है। यह उदाहरण यह भी स्पष्ट करता है कि मज़बूत नेतृत्व की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है। उपयुक्त संस्थागत तंत्र होने पर उभरते बाज़ारों में भी जोखिम वाले प्रयास सफल हो सकते हैं।
इस गति को बनाए रखने के लिए आवश्यक होगा:
● अनुसंधान और विकास के बुनियादी ढांचे में निरंतर निवेश.
● स्टार्टअप तंत्र का और अधिक गहराई से विकास.
● वैश्विक स्तर पर मजबूत साझेदारियों का विस्तार.
● स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और किफायतीपन पर लगातार और स्पष्ट ध्यान.
आई3 परियोजना रणनीतिक सहयोग का एक स्पष्ट और प्रभावी खाका प्रस्तुत करती है। सलाहकार समूहों, साझा बुनियादी ढांचे और नीतिगत समर्थन को एक साथ जोड़कर यह दिखाती है कि किस तरह परिवर्तनकारी नवाचारों को बड़े स्तर पर लागू कर लोगों के जीवन में सुधार लाया जा सकता है।
Join the Conversation